बुधवार, 29 अगस्त 2012

अकेले-अकेले :२४-११-२००७

जलता रहता हूँ मै, दीये की बत्ती की तरह अकेले-अकेले|
कैसे बताऊँ मैं तुझे किस तरह जलें है मेरे दिल , अकेले -अकेले |

सोचता हूँ कैसी थी, तेरे आँखों की काजल,
 तेरी ओ बतियाँ, हँसती-मुस्काती होठों की ,

जलाती है उम्मीद की किरण मेरे इस बुझे दिल में|
तेरे बिन दिन बिताएं हैं गिन-गिन के, अकेले-अकेले |

आएगा जाने कब ओ दिन, जब हम फिर मिलेंगे अकेले-अकेले |
दिलों में ,बजेगी जाने कब फिर से शहनाई अकेले -अकेले |

झगड़ता रहता हूँ ,बीती बातों को याद कर खुद से अकेले अकेले|
दिल की दर्द को अश्क बनाकर बहता रहता हूँ अकेले अकेले |

साथ बिताए थे, जो पल हमने  याद आतें हैं मुझे ,
सकूँ से सोंच भी ना पाऊं  ये पल सताते हैं मुझे |

याद कर उन पल को खुश हो लेता हूँ मैं, दो पल अकेले अकेले |
दीये की  तरह बुझ जाना बन गयी है मेरी आदत, अकेले अकेले |

::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"

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