शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

तेरा हूँ मै बस तेरा ! १-१२-२००७

मै तेरे प्यार में  पागल हूँ , मै तेरा हूँ मै बस तेरा !
तु मेरी बनकर रहना सदा, मै तेरा हूँ मै बस तेरा!

मै तेरे प्यार को याद करूँ तो, कट जाता सारा दिन मेरा |
मै तेरे चहरे का किताब पढूं ,दिन हो या हो रात सही !

तु मेरे ख्वाबों में खोयी रहो ,रब से मेरी दरख्वास्त यही..!

तु सुन मेरी या ना ही सही, दिल की सुन लेना बस यार सही|
मेरे दिल की आवाज़ है तु, तु मेरी है बस है मेरी !

दिल का करार खो जाता है, हो जाता हूँ बेचैन बड़ी |
मेरे जीवन की रास है तु, तु दिल की  है अब चैन मेरी !

तु मेरे जीने का सहारा है, इस कश्ती का सहारा तुही !
तु ही मेरी मंजिल तु ही, अब तेरे सिवा कुछ और नहीं!

तेरे प्यार में जीना है, तेरे प्यार को पाना है मुझको |
तु मुझको भूल ना जाना कहीं, ये प्यार है कोई खेल नहीं!

रब से एक गुजारिश है मेरी ,सारा जीवन मै बिताऊं साथ तेरे|
मै तेरे माथे की बिंदिया बनू, तु मेरे दिल की  रानी बने ||
::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"

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रविवार, 9 सितंबर 2012

ख्वाब उनकी यादों का | ३०-११-२००७

ये मुझे क्या हो गया ,मेरा दिल मेरी बात ना सुन रहा |
चैन दिल का खो गया मेरा दिल मेरे बस में ना अब रहा ||
कुछ कहता  हूँ ,कुछ करता है ,
कुछ करता हूँ, कुछ हो जाता है , 
कोई समझाए इसे!

किसी की  सूरत पे ये मर गया , मेरा दिल बेगाना हो गया |
जो था वो भी खो गया ,जो अपना था वो भी गया ||
दिल में तस्वीर बनाता हूँ ,
उसकी यादों को मै सजाता हूँ,
उसका चेहरा नुरानी याद  आता है ,
ओ हर पल याद आये मुझे !

क्या सूरत थी ,सूरत उसकी मुमताज बेगम की तरह| 
चाँद सा मुखडा उसका ,लग रहा ओ परियों की  तरह ||
लगी जन्नत से ओ आयी है ,
आशा मेरे मन में ओ जगाई है ,
कोई बताये उसे !

मै रह ताकता रहा ,चकोर - चाँद की  तरह |
वो ना आयी इधर मै फिर भी आस करता  रहा  ||
मन में उम्मीद आया है , 
प्यारा सा ख्याल लाया है ,
तु बन मेरी  ,मै बनू तेरा ,
कोई बताये उसे !

तुझे याद करूँ मै हर लम्हा तेरे सिवा ना कोई काम  रहा|
तेरी याद ही है करार मेरा मेरे दिल का चैनों सकूँ मेरा||

:: राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"
(dictionary :: Mukda/Mukhada,surat = Face;Nurani=beautiful; tera=yours; )
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बुधवार, 29 अगस्त 2012

ख्वाहिश मेरे मन की... २८-११-२००७

एक ख्वाहिश मन में रह गयी मेरी ,
साथ होते हम चांदनी रात में,
चाँद को देखते गले में हाँथ डाल के|

चल रही होती मंद- मंद पवन,
 मुसकाती हुयी, हलकी -हलकी |
जो जगाती एक नई हलचल भी |

तेरी बाँहों का सेहरा होता, मेरे बदन पर ,
मै तेरी पलकों के साये में सर रख कर ,
सोया होता चांदनी रात में, 
पूनम की रात हसीं बन जाती |

तेरी बदन की खुशबु फिजा में बह रही होती |
पलके मंद-मंद खुशबु से, मदहोश हो रही होती| 

ख्यालों में खोये होते हम खामोश रात में 
साथ साथ होते हम चांदनी रात में ,
तेरा चेहरा मेरी ओर होता ,
मै तेरे चेहरे को देख रहा होता ,
तु मेरी नयनोंसे ,मै तेरे  नयनों से,
एक दूसरे के दिल में देख रहे होते |

दिल में तेरे लिए सारी  ख्वाहिश रह गयी ,
धरी की  धरी उस काली रात में ,
एक ख्वाहिश रह गयी मेरी ,
साथ-साथ होते हम चांदनी रात में | 
::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"
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अकेले-अकेले :२४-११-२००७

जलता रहता हूँ मै, दीये की बत्ती की तरह अकेले-अकेले|
कैसे बताऊँ मैं तुझे किस तरह जलें है मेरे दिल , अकेले -अकेले |

सोचता हूँ कैसी थी, तेरे आँखों की काजल,
 तेरी ओ बतियाँ, हँसती-मुस्काती होठों की ,

जलाती है उम्मीद की किरण मेरे इस बुझे दिल में|
तेरे बिन दिन बिताएं हैं गिन-गिन के, अकेले-अकेले |

आएगा जाने कब ओ दिन, जब हम फिर मिलेंगे अकेले-अकेले |
दिलों में ,बजेगी जाने कब फिर से शहनाई अकेले -अकेले |

झगड़ता रहता हूँ ,बीती बातों को याद कर खुद से अकेले अकेले|
दिल की दर्द को अश्क बनाकर बहता रहता हूँ अकेले अकेले |

साथ बिताए थे, जो पल हमने  याद आतें हैं मुझे ,
सकूँ से सोंच भी ना पाऊं  ये पल सताते हैं मुझे |

याद कर उन पल को खुश हो लेता हूँ मैं, दो पल अकेले अकेले |
दीये की  तरह बुझ जाना बन गयी है मेरी आदत, अकेले अकेले |

::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"

बुधवार, 22 अगस्त 2012

बेबसी दिल के दर्द का ! २४-११-२००७

मेरे दिल में गम पहले से कम ना था, जो तुने दिया इसका दर्दे गम है मुझे.

प्यार किया था तुझसे बेइंतहा इसका सिला मिला मुझे 

तेरे दिल की गहराइयों में ना पहुंचा मेरा प्यार इसका गम है मुझे .

मेरी तक़दीर ने दिया है अजीबोगरीब तोहफा मुझे 

जिसे ना कह सकता न् ही  अब बता  सकता तुझे .

तुझे जो करना था कर डाला पर,

 मेरे पे क्या बीतेगी  जरा भी ना सोचा तुमने .

अपने दर्द को दिखाऊ तुम्हे कैसे अश्क बन कर आँखों से बरसता है ये. 

:: राम प्रकाश   कुशवाहा  "औलिया"

डरता हूँ मै और दिल मेरा !

तेरी हंसी चेहरा धडकता है दिल मेरा !

हँस के बातें करना बहकता है दिल मेरा!

तेरे चेहरे की रौनक मजबूर करता है मुझे !

कहूँ दिल की बात ,कहता है दिल मेरा!

तुझको पाया है बड़ी मुश्किल से ,

खो ना दूँ , डरता हूँ मै और दिल मेरा!

अर्ज है तुमसे कभी जुदा ना होना मुझसे !

तन्हाई की बस तुम ही एक रोनक हो ,दूर ना होना मुझसे!

::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"

रविवार, 8 जुलाई 2012

बदलते लब्ज ......

प्यार में था तब ........................

उगता सूरज शाम में ढल जाता है,

पर तेरी याद दिल में हर दम रहता है |

चांदनी रात में जब  चाँद को देखता हूँ ,

तेरा चेहरा चाँद में नजर आता है ||


और  जब दिल टुटा तब...


उगता सूरज शाम में ढल जाता है,

पर तेरी याद दिल में हर दम रहता है |


चांदनी रात में जब  चाँद को देखता हूँ ,

तेरा चेहरा चाँद में अब भी नजर आता है ||


::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"
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जब याद तेरी आती है ...८-८-२००७

ठंडी आह मुझे  तड़पाती है,

 जब-जब याद तेरी मुझे आती है |



याद कर लेता हूँ बीते ज़माने को,
 क्षण भर खुश हो लेता हूँ  ,



खुशी तो मेरी खामोश हुयी इस कदर,
 भूल गया मैं हँसना उम्र भर |



फिर भी मीठी यादें कभी-कभी हँसा जाती है ,
जब-जब याद तेरी मुझे आती है |



दिल में एक तीर सी चुभ जाती है ,
दिल तो संभल गया है|



 पर आँखें नम हो जाती है ,
जब -जब याद मुझे तड़पाती है |



अब याद क्या करूँ तुझे बेवफ़ा,
 पर कमबख्त दिल है ,जो गुश्ताखी कर देता है|



समझाता हूँ तो समझ जाता है,
पर कुछ क्षण बाद फिर याद तुझे ही करता है.

::राम  प्रकाश  कुशवाहा  "औलिया "

बुधवार, 27 जून 2012

गलत समझी तो समझी कैसे ?१६-७-२००७

तुने मुझे गलत समझी तो समझी कैसे ?

मैंने तो अपने दिल की बात कही पर तू गलत समझी कैसे ?

शायद ये मेरी गलती थी जो मैं तुम्हे अपने दिल का हाल कहा.

पर तू इसे गलत समझी तो समझी कैसे ?

उतावलापन सही होता है पर ज्यादा सही नहीं होता.

मेरा उतावलापन देखकर शायद गलत समझी मुझे.

मेरे प्यार के इजहार में कुछ गलत नहीं था |

पर तुने उसे गलत समझी तो समझी कैसे ?

हर दिल की बातें नहीं करता मै अपने दिल की करता हूँ ,

दिल से दिल नहीं मिला तो इसे समझूँ कैसे?

अब शायद आखरी हो गुजारिश मेरी 
ये मेरे दिल की आवाज है पर मै अब अपने दिल को समझाऊँ कैसे?
:::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"

शुक्रवार, 15 जून 2012

दिल की आग बुझाऊँ कैसे ?...१६-७-२००७


दिल जलता है इस दिल की आग बुझाऊँ  कैसे?
जले पर मैंने खुद नमक छिड़का अब जलन मिटाऊँ कैसे?
माना मेरी गलती थी पर अब इसे सुधारूँ कैसे?
तुमने तो बहुत कुछ बोला एहसास के बारे में ,
पर  मैं अब अपनी एहसास तुम्हें  सुनाऊँ कैसे?
 तेरी कद्र करता था,तेरी सपने देखा करता था ,
पर मै अब इन बातों को तुम्हें समझाऊँ कैसे?
तुने मुझे गलत समझ लिया,
 अब सही बातें तुम्हे समझाऊँ कैसे?
तेरी बातों को मैंने अपने नसीब से जोड़ा,
पर अब अपने बदनसीब दिल को समझाऊँ कैसे?
दिल संभलता नहीं ,रोते दिल को दिलासे दूँ तो अब दूँ कैसे?
दिल जलता है इस दिल की आग  बुझाऊँ  कैसे?
::::by:Ram Prakash Kushwaha "aulia"
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बुधवार, 13 जून 2012

पर उसने बुरा मान लिया ....१६-७-२००७


बहुत कुछ सोचा था ,पर 
रेत पर महल बनाने चला था .


झोका हवा का लहरों के साथ 
अपने में मिला गया.

बदनसीबी मेरी थी ,जो 
नसीब को बनाने चला था .

बिजली गिरी झंझावत के साथ 
अपने में मिटा गयी.

सोचा था अच्छा पर, उसने
 बुरा मान लिया.


पर मै खड़ा मूक सा चेहरे पर 
उभरती भावों को देखता रह गया .

:::: Ram Prakash Kushwaha 'aulia'

मंगलवार, 12 जून 2012

दिल धड़का था जरा सा ....१३-७-२००७

जब तुझसे मिला मैं पहली बार ,
दिल धड़का था जरा सा .

तुझे देखा था जब प्यार भरी निगाहों से,
तब दिल धड़का था जरा सा .

ना जाने कब ये हुआ कि,
मैंने  चाहा तुझे जरा सा .

प्यार फिर कुछ और बढ़ा,
और बढ़ा जरा सा .
     ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"

दिल दुखाना जिनकी आदत सी हो ....२५-७-२००७

उन लोगों का क्या कहना ,
जिनकी दिल से खेलने की आदत हो.

उन लोगों का क्या कहना ,
दिल तोड़ना जिनकी फितरत हो.


दिल की तड़प को जाना नहीं ,
दिल की बातें करना जिनकी हसरत हो .

दिल को समझने के लिए दिल की जरुरत होती है.


उन लोगों का क्या कहना ,
जिनके पास दिल ही न हो .

दिल की बातों को मजाक बनाना ,
जिनकी आदत हो.

उन लोगों का क्या कहना ,
जिनकी लोगों का दिल दुखाना आदत सी हो.


वफ़ा तो किसी से किया ही नहीं ,


उन बेवफ़ा लोगों का क्या कहना ,
बेवफाई जिनकी रोज की आदत हो.
टूटे दिल की नसीहत है ये ,
उससे प्यार का इजहार करना,
जिसे प्यार निभाने की आदत हो.
 ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"
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सोमवार, 11 जून 2012

चुप रह जाते हैं हम ...१२-७-२००७

जिंदगी में कई बार चुप रह जातें हैं हम.
चाह कर भी कुछ ना कह पातें हैं हम.

समय बीत जाता है हाथ पकड़े रह जातें हैं हम.
बीतते लम्हों को चुपचाप देखतें रह जाते हैं हम .

चाह कर भी कुछ ना कर पातें हैं हम.

मजबूर इंसान हालात के मारे बेचारे बेसहारों की तरह,
टुक टुक देखतें रह जातें हैं हम .

सोंचतें हैं, हमें ये करना है पर समय चला जाता है,
और हम हाथ मलते रह जातें है हम.

समय की पहचान करना हमारी फितरत होनी चाहिए.
पर समय बीत जाता है और पहचान नहीं कर पातें हैं हम.
 ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"
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संभाल लूँगा बड़ी मुश्किल से ? ११-७-२००७

दिल को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से,

हालात  समझकर दिल को समझाया है बड़ी मुश्किल से,

तुने चाह कर भी ना चाही मेरी बदनसीबी थी ,

मैंने अपने आप को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से.

एक दिल तेरा था एक मेरा भी,

पर मैंने अपने दिल को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से .

समय भी खराब था और दिन भी खराब थे ,

ये यादें जेहन में सम्हाल कर रखा है बड़ी मुश्किल से.

प्यार में पागल हो जातें हैं लोग पर,

मैंने अपने आप को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से.

तू सामने आये तो शायद बात भी ना हो ,

उस समय अपने आप को सम्हाल लूँगा बड़ी मुश्किल से.
::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"

मेरा कसूर क्या है? २१-७-२००७

दिल तोडने वाली ऐ बता मेरा कसूर क्या है?
मैंने प्यार किया है तुझसे, इसमें  गलत क्या है?

मेरी दिल-ए-जिगर रोता दिल देखने की जरुरत क्या है ?

मैंने जो किया है उसकी सजा बता मुझे 
मैंने प्यार किया था तुझसे,इसमें गलत क्या है ?

तेरे दिल में अगर कोई था तो गलत क्या था ?

तुने तो एक झटके में दिल तोड़ा 
इसमे दिल का कसूर क्या था?

मैंने तो प्यार किया था तुझसे ,इसमें गलत क्या है?

मैं  तड़पता था तुझसे मिलने को इसमे गलत क्या था ?
तू भी तो तड़पती थी मिलने को इसमे गलत क्या था?

ये अलग और बात है तू किसी और को चाही
तो इसमें मेरा कसूर क्या है?

तुने एक झटके में दिल तोड़ा 
इसमें  दिल का कसुर क्या था ?

मैंने चाहा तुझे दिलों जन से तू मुझे नहीं चाही 
तो इसमे मेंरा कसूर क्या है?

प्यार तो प्यार होता है इसमें  दिल का कसूर क्या है ?
दिल तोड़ने वाली ऐ बता मेरा कसूर क्या है?
 ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"