बुधवार, 29 अगस्त 2012

ख्वाहिश मेरे मन की... २८-११-२००७

एक ख्वाहिश मन में रह गयी मेरी ,
साथ होते हम चांदनी रात में,
चाँद को देखते गले में हाँथ डाल के|

चल रही होती मंद- मंद पवन,
 मुसकाती हुयी, हलकी -हलकी |
जो जगाती एक नई हलचल भी |

तेरी बाँहों का सेहरा होता, मेरे बदन पर ,
मै तेरी पलकों के साये में सर रख कर ,
सोया होता चांदनी रात में, 
पूनम की रात हसीं बन जाती |

तेरी बदन की खुशबु फिजा में बह रही होती |
पलके मंद-मंद खुशबु से, मदहोश हो रही होती| 

ख्यालों में खोये होते हम खामोश रात में 
साथ साथ होते हम चांदनी रात में ,
तेरा चेहरा मेरी ओर होता ,
मै तेरे चेहरे को देख रहा होता ,
तु मेरी नयनोंसे ,मै तेरे  नयनों से,
एक दूसरे के दिल में देख रहे होते |

दिल में तेरे लिए सारी  ख्वाहिश रह गयी ,
धरी की  धरी उस काली रात में ,
एक ख्वाहिश रह गयी मेरी ,
साथ-साथ होते हम चांदनी रात में | 
::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"
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