एक ख्वाहिश मन में रह गयी मेरी ,
साथ होते हम चांदनी रात में,
चाँद को देखते गले में हाँथ डाल के|
चल रही होती मंद- मंद पवन,
मुसकाती हुयी, हलकी -हलकी |
जो जगाती एक नई हलचल भी |
तेरी बाँहों का सेहरा होता, मेरे बदन पर ,
मै तेरी पलकों के साये में सर रख कर ,
सोया होता चांदनी रात में,
पूनम की रात हसीं बन जाती |
तेरी बदन की खुशबु फिजा में बह रही होती |
पलके मंद-मंद खुशबु से, मदहोश हो रही होती|
ख्यालों में खोये होते हम खामोश रात में
साथ साथ होते हम चांदनी रात में ,
तेरा चेहरा मेरी ओर होता ,
मै तेरे चेहरे को देख रहा होता ,
तु मेरी नयनोंसे ,मै तेरे नयनों से,
एक दूसरे के दिल में देख रहे होते |
दिल में तेरे लिए सारी ख्वाहिश रह गयी ,
धरी की धरी उस काली रात में ,
एक ख्वाहिश रह गयी मेरी ,
साथ-साथ होते हम चांदनी रात में |
::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"
without written permission of Ram Prakash ,commercially print /distribute /use of any of this blog poetry is /are prohibited||subject to Aurangabad (bihar) jurisdiction only.
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