बुधवार, 27 जून 2012

गलत समझी तो समझी कैसे ?१६-७-२००७

तुने मुझे गलत समझी तो समझी कैसे ?

मैंने तो अपने दिल की बात कही पर तू गलत समझी कैसे ?

शायद ये मेरी गलती थी जो मैं तुम्हे अपने दिल का हाल कहा.

पर तू इसे गलत समझी तो समझी कैसे ?

उतावलापन सही होता है पर ज्यादा सही नहीं होता.

मेरा उतावलापन देखकर शायद गलत समझी मुझे.

मेरे प्यार के इजहार में कुछ गलत नहीं था |

पर तुने उसे गलत समझी तो समझी कैसे ?

हर दिल की बातें नहीं करता मै अपने दिल की करता हूँ ,

दिल से दिल नहीं मिला तो इसे समझूँ कैसे?

अब शायद आखरी हो गुजारिश मेरी 
ये मेरे दिल की आवाज है पर मै अब अपने दिल को समझाऊँ कैसे?
:::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"

शुक्रवार, 15 जून 2012

दिल की आग बुझाऊँ कैसे ?...१६-७-२००७


दिल जलता है इस दिल की आग बुझाऊँ  कैसे?
जले पर मैंने खुद नमक छिड़का अब जलन मिटाऊँ कैसे?
माना मेरी गलती थी पर अब इसे सुधारूँ कैसे?
तुमने तो बहुत कुछ बोला एहसास के बारे में ,
पर  मैं अब अपनी एहसास तुम्हें  सुनाऊँ कैसे?
 तेरी कद्र करता था,तेरी सपने देखा करता था ,
पर मै अब इन बातों को तुम्हें समझाऊँ कैसे?
तुने मुझे गलत समझ लिया,
 अब सही बातें तुम्हे समझाऊँ कैसे?
तेरी बातों को मैंने अपने नसीब से जोड़ा,
पर अब अपने बदनसीब दिल को समझाऊँ कैसे?
दिल संभलता नहीं ,रोते दिल को दिलासे दूँ तो अब दूँ कैसे?
दिल जलता है इस दिल की आग  बुझाऊँ  कैसे?
::::by:Ram Prakash Kushwaha "aulia"
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बुधवार, 13 जून 2012

पर उसने बुरा मान लिया ....१६-७-२००७


बहुत कुछ सोचा था ,पर 
रेत पर महल बनाने चला था .


झोका हवा का लहरों के साथ 
अपने में मिला गया.

बदनसीबी मेरी थी ,जो 
नसीब को बनाने चला था .

बिजली गिरी झंझावत के साथ 
अपने में मिटा गयी.

सोचा था अच्छा पर, उसने
 बुरा मान लिया.


पर मै खड़ा मूक सा चेहरे पर 
उभरती भावों को देखता रह गया .

:::: Ram Prakash Kushwaha 'aulia'

मंगलवार, 12 जून 2012

दिल धड़का था जरा सा ....१३-७-२००७

जब तुझसे मिला मैं पहली बार ,
दिल धड़का था जरा सा .

तुझे देखा था जब प्यार भरी निगाहों से,
तब दिल धड़का था जरा सा .

ना जाने कब ये हुआ कि,
मैंने  चाहा तुझे जरा सा .

प्यार फिर कुछ और बढ़ा,
और बढ़ा जरा सा .
     ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"

दिल दुखाना जिनकी आदत सी हो ....२५-७-२००७

उन लोगों का क्या कहना ,
जिनकी दिल से खेलने की आदत हो.

उन लोगों का क्या कहना ,
दिल तोड़ना जिनकी फितरत हो.


दिल की तड़प को जाना नहीं ,
दिल की बातें करना जिनकी हसरत हो .

दिल को समझने के लिए दिल की जरुरत होती है.


उन लोगों का क्या कहना ,
जिनके पास दिल ही न हो .

दिल की बातों को मजाक बनाना ,
जिनकी आदत हो.

उन लोगों का क्या कहना ,
जिनकी लोगों का दिल दुखाना आदत सी हो.


वफ़ा तो किसी से किया ही नहीं ,


उन बेवफ़ा लोगों का क्या कहना ,
बेवफाई जिनकी रोज की आदत हो.
टूटे दिल की नसीहत है ये ,
उससे प्यार का इजहार करना,
जिसे प्यार निभाने की आदत हो.
 ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"
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सोमवार, 11 जून 2012

चुप रह जाते हैं हम ...१२-७-२००७

जिंदगी में कई बार चुप रह जातें हैं हम.
चाह कर भी कुछ ना कह पातें हैं हम.

समय बीत जाता है हाथ पकड़े रह जातें हैं हम.
बीतते लम्हों को चुपचाप देखतें रह जाते हैं हम .

चाह कर भी कुछ ना कर पातें हैं हम.

मजबूर इंसान हालात के मारे बेचारे बेसहारों की तरह,
टुक टुक देखतें रह जातें हैं हम .

सोंचतें हैं, हमें ये करना है पर समय चला जाता है,
और हम हाथ मलते रह जातें है हम.

समय की पहचान करना हमारी फितरत होनी चाहिए.
पर समय बीत जाता है और पहचान नहीं कर पातें हैं हम.
 ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"
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संभाल लूँगा बड़ी मुश्किल से ? ११-७-२००७

दिल को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से,

हालात  समझकर दिल को समझाया है बड़ी मुश्किल से,

तुने चाह कर भी ना चाही मेरी बदनसीबी थी ,

मैंने अपने आप को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से.

एक दिल तेरा था एक मेरा भी,

पर मैंने अपने दिल को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से .

समय भी खराब था और दिन भी खराब थे ,

ये यादें जेहन में सम्हाल कर रखा है बड़ी मुश्किल से.

प्यार में पागल हो जातें हैं लोग पर,

मैंने अपने आप को सम्हाला है बड़ी मुश्किल से.

तू सामने आये तो शायद बात भी ना हो ,

उस समय अपने आप को सम्हाल लूँगा बड़ी मुश्किल से.
::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"

मेरा कसूर क्या है? २१-७-२००७

दिल तोडने वाली ऐ बता मेरा कसूर क्या है?
मैंने प्यार किया है तुझसे, इसमें  गलत क्या है?

मेरी दिल-ए-जिगर रोता दिल देखने की जरुरत क्या है ?

मैंने जो किया है उसकी सजा बता मुझे 
मैंने प्यार किया था तुझसे,इसमें गलत क्या है ?

तेरे दिल में अगर कोई था तो गलत क्या था ?

तुने तो एक झटके में दिल तोड़ा 
इसमे दिल का कसूर क्या था?

मैंने तो प्यार किया था तुझसे ,इसमें गलत क्या है?

मैं  तड़पता था तुझसे मिलने को इसमे गलत क्या था ?
तू भी तो तड़पती थी मिलने को इसमे गलत क्या था?

ये अलग और बात है तू किसी और को चाही
तो इसमें मेरा कसूर क्या है?

तुने एक झटके में दिल तोड़ा 
इसमें  दिल का कसुर क्या था ?

मैंने चाहा तुझे दिलों जन से तू मुझे नहीं चाही 
तो इसमे मेंरा कसूर क्या है?

प्यार तो प्यार होता है इसमें  दिल का कसूर क्या है ?
दिल तोड़ने वाली ऐ बता मेरा कसूर क्या है?
 ::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"