जिंदगी में कई बार चुप रह जातें हैं हम.
चाह कर भी कुछ ना कह पातें हैं हम.
समय बीत जाता है हाथ पकड़े रह जातें हैं हम.
बीतते लम्हों को चुपचाप देखतें रह जाते हैं हम .
चाह कर भी कुछ ना कर पातें हैं हम.
मजबूर इंसान हालात के मारे बेचारे बेसहारों की तरह,
टुक टुक देखतें रह जातें हैं हम .
सोंचतें हैं, हमें ये करना है पर समय चला जाता है,
और हम हाथ मलते रह जातें है हम.
समय की पहचान करना हमारी फितरत होनी चाहिए.
पर समय बीत जाता है और पहचान नहीं कर पातें हैं हम.
पर समय बीत जाता है और पहचान नहीं कर पातें हैं हम.
::::by Ram Prakash Kushwaha "aulia"
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