बहुत कुछ सोचा था ,पर
रेत पर महल बनाने चला था .
झोका हवा का लहरों के साथ
झोका हवा का लहरों के साथ
अपने में मिला गया.
बदनसीबी मेरी थी ,जो
नसीब को बनाने चला था .
बिजली गिरी झंझावत के साथ
अपने में मिटा गयी.
सोचा था अच्छा पर, उसने
बुरा मान लिया.
पर मै खड़ा मूक सा चेहरे पर
उभरती भावों को देखता रह गया .
पर मै खड़ा मूक सा चेहरे पर
उभरती भावों को देखता रह गया .
:::: Ram Prakash Kushwaha 'aulia'
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