दिल ने इतने दर्द झेले है साहब!
अब कोई जख्म दर्द नहीं देते||
देता है तो दर्द वही जिसे हम अपना समझते हैं|
क्या करे हम अपने आदत से मजबूर है|
हम अपनी आदत से गुरेज नही करते,
कोई सख्स आता है मदद लेने हमसे||
बेझिझक बे समझे बुझे मदद कर देते है|
और हमें कल को वही सख्स , बड़ी इज्जत से दगा
देते है||
जाने क्यों दिल समझता नही
नासमझ समझ कर भी नासमझी कर जाता है ये|
क्या करें कि तुम समझोगे बता दो ऐ सनम |
सब लुटा के भी न समझे तो हम क्या करे ||
खाली हाथ आये , खाली ही जाना है|
जान बुझ कर भी रखे तो हम क्या करे||
तेरे हाथ में न कुछ है न होता है बन्दे
सब रहमो करम खुदा के मर्जी से है|
जानकर भी दुहाई दे तो हम क्या करे||
::राम प्रकाश कुशवाहा "औलिया"
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